चित्र व आलेख- पूर्णिमा सिंह
Kunghusu Poone- कुनघुसू पूने, जिसे कुनघुसू पूर्णिमा भी कहा जाता है, बुन्देलखण्ड का एक विशिष्ठ त्योहार है, जो अषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बेटियों और कन्याओं का सम्मान किया जाता है। कुनघुसू पूने सास अपनी बहू का सम्मान करती है। इस दिन पूजागृह के चारों कोनो में दीवारों पर सास अपनी बहुओं की पुतरियांनुमा आकृतियां चित्रित करती हैं। जो महिलाओं के सम्मान, पारिवारिक सद्भाव व समरूपता का प्रतीक होती हैं। यह आकृतियां कुल की उन आदर्श बहुओं का प्रतीकात्मक चित्रण होती हैं, जिन्होने परिवार की मर्यादा को बनाए रखने और वशं वृद्धि में अपना योगदान दिया है। इन पुतरियों का घी गुड़ से पूजन किया जाता है तथा कहानी भी सुनाई जाती है। इस व्रत के द्वारा सास अपनी ऐसी बहु की कामना करती है जो लक्ष्मी बनकर घर को धन-धान्य से भर दे।
मोरी चन्दा चकोर, मोरी चन्दा चकोर . . .
कजरा लगा के कोरई कोर। मोरी चन्दा चकोर . . .
अरे काजर काहे आंजे गोरी,
तोरे तो नैना काजर बिना कारे। मोरी चन्दा चकोर . . .





























































अति मौलिक प्रस्तुति, विलुप्त होने वाली , बधाई हो