चित्र व आलेख- विकास वैभव
Maharaja Khet Singh Khangar ji – रा’नौधन (तृतीय) के बाद रा’कवट (द्वितीय) सन् 1140 ई. में जूनागढ़ की गद्दी पर बैठे। इन्होने सन् 1145 ई. तक राज्य किया। सन् 1145 ई. में गुजरात के सोलंकी कुमार पाल ने जूनागढ़ पर आक्रमण किया और रा’कवट को मारकर जूनागढ़ पर अधिकार कर लिया। महाराजा खेत सिंह खंगार का जन्म जूनागढ़ (गुजरात) में 27 दिसम्बर, सन् 1140 ई॰ में हुआ था। इनके पिता का नाम राजा रा‘कवट (द्वितीय) तथा माता का नाम किशोर कुॅंवर बाई था। रा’कवट के ज्येष्ठ पुत्र खेतसिंह जूनागढ़ छोड़ कर अपने निकट सम्बन्धी दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के पास चले गये। पृथ्वीराज चौहान ने खेत सिंह खंगार को बन्दोवस्त के लिये अजमेर में रखा था। खेत सिंह खंगार के सहयोग से पृथ्वीराज चौहान ने कई युद्ध लड़े। पृथ्वीराज चौहान जब संयोगिता हरण को गये तब खेत सिंह खंगार भी साथ थे।

11वीं सदी में उत्तर भारत में कन्नौज में गहड़वाल वंश, दिल्ली और अजमेर में चौहान वंश, जूनागढ़ में खंगार वंश, मेवाड़ में सिसौदिया वंश और जैजाक भुक्ति (वर्तमान बुन्देलखण्ड) में चन्देल वंश के राजपूतों का राज्य था। चन्देल शासक परिमर्ददेव (1165 ई॰ से 1203 ई॰ तक) अपने वैभव की पराकाष्ठा पर था। वह उत्तर भारत का सार्वभौम शासक बनना चाहता था। पृथ्वीराज चौहान को चन्देल शासक की यह बात सहन नहीं हुई। उन्होने चन्देलों से युद्ध करने की ठानी और खेत सिंह खंगार के साथ चन्देल राज्य पर आक्रमण कर दिया। उरई (जिला जालौन) के निकट घमासान युद्ध हुआ और चन्देल शासक परिमर्ददेव बुरी तरह पराजित हुआ। इस युद्ध में ऊदल मारे गये और आल्हा रण छोड़ कर कहीं चले गये। पृथ्वीराज ने चन्देल राज्य पर अधिकार कर लिया। चन्देल-चौहान युद्ध की यह घटना सन् 1182 की है, जैसा कि मदनपुर (ललितपुर) के शिलालेख से स्पष्ट है।

दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान ने चन्देल राजा परिमर्ददेव को कालिंजर का किला एवं आसपास का क्षेत्र वापिस दे दिया। यमुना के ऊपर का भाग जो दिल्ली और कन्नौज राज्यों की सीमाओं से लगा हुआ था, उसे अपने दिल्ली राज्य में मिला लिया। महोबा एवं उसके आसपास का क्षेत्र मन्त्री पंज्जुन राय को सौप दिया। शेष भाग खेत सिंह खंगार के अधिकार में देकर, उन्हें उस क्षेत्र का शासक घोषित किया। सन् 1181 ई॰ में ही इनका राज्याभिषेक किया गया। खेत सिंह खंगार ने अपने क्षेत्र पर अधिकार करके ‘‘जिझौतिखण्ड’’ राज्य की स्थापना की और कुण्डार में एक सुदृढ़ किले का निर्माण कराकर उसे अपनी राजधानी बनाया। सन् 1192 ई॰ में तराईन का युद्ध दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान एवं विदेशी आक्रान्ता मोहम्मद गौरी के मध्य लड़ा गया, जिसमें दिल्ली मोहम्मद गौरी के अधीन हो गई और खेत सिंह खंगार ने ‘‘जिझौतिखण्ड’’ को स्वतन्त्र हिन्दू राज्य घोषित कर दिया।

खेत सिंह खंगार का पहला विवाह बघेलों में हुआ, जिससे पुत्र आसल, नन्दपाल व पुत्री विजय कुॅंवर हुई। विजय कुॅंवर का विवाह भीमसेन भदौरिया (भदोनगढ़) से हुआ था। खेत सिंह का दूसरा विवाह राजा ज्ञानपाल गहरवार की पुत्री राजल दे से हुआ, जिससे समर्थ सिंह, नवल पाल हुये। तीसरा विवाह अबला की बेटी तेजसी से हुआ, जिससे सरदार सिंह, नाहर सिंह हुये तथा एक कन्या जसकुवॅंर हुई, जिसका विवाह गांगरौनी के पिल्ल पिंजर खींची से हुआ था। जब खेत सिंह ने गढ़कुण्डार जीता उस समय आलन गौड़ की बेटी चम्पा देवी को दासी बना कर रख लिया था, जिससे कौंतल सिंह दासी पुत्र हुआ। इनकी मृत्यु सन् 1212 ई॰ में हो गई थी। खेत सिंह खंगार (1182-1212 ई॰) के पश्चात क्रमशः नन्दपाल खंगार (1212-1241 ई॰), छत्रशाल सिंह खंगार (1241-1279 ई॰), खूब सिंह खंगार (1279-1309 ई॰) तथा मान सिंह खंगार (1309-1347 ई॰ ) ‘‘जिझौतिखण्ड’’ के शासक हुये।

गढ़कुण्डार क्षत्रीय खंगार समाज का ऐतिहासिक तीर्थस्थल एवं सामाजिक आस्था का केन्द्र है। गढ़कुण्डार में वर्ष 2006 में समाज के राष्ट्रीय महाधिवेशन में मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा क्षत्रीय खंगार वंश के जनक महाराजा खेत सिंह की जयन्ति के उपलक्ष्य में गढ़कुण्डार महोत्सव प्रत्येक वर्ष 27 से 29 दिसम्बर तक (तीन दिवसीय) जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित करना सुनिश्चित किया गया। जिस में प्रथम दिवस 27 दिसम्बर को महाराजा खेत सिंह खंगार का जयन्ती मनाकर ख्ंगार क्षत्रीय की कुलदेवी गजानन माता के मन्दिर तक विशाल शोभा यात्रा निकाली जाती है, जिसमें देश के विभिन्न प्रदेशों से समाज के लाखों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। खंगार क्षत्रीय समाज के द्वारा तीन दिन तक लगातार निःशुल्क भण्डारा (भोजन) कराया जाता है। शाम के समय मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग की ओर से विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति से ओत-प्रोत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, साथ ही मेला भी लगता है। इस बार भी गढ़कुण्डार महोत्सव में लाखों श्रृद्धालुओं के शामिल होने की सम्भावना है।


























































Good research work on Khetsingh khangaar