Home रीति रिवाज़ संकष्टी गणेश चतुर्थी

संकष्टी गणेश चतुर्थी

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चित्र व आलेख- विकास वैभव

Sankashti Ganesh Chaturthi- हर माह की कृष्ण पक्ष चौथ को संकष्टी गणेश चौथ के रूप में मनाया जाता है, जिसका अर्थ है ‘संकटों को हरने वाली चतुर्थी’। यह व्रत भगवान श्री गणेश को समर्पित है, जो जीवन के सभी कष्टों, बाधाओं को दूर करने, संतान प्राप्ति, आर्थिक लाभ और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। लेकिन जब यह चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी (बड़े गणेश) कहा जाता है, क्योंकि यह अंगारक (मंगल ग्रह) से जुड़ी होनं के कारण यह सामान्य संकष्टी चतुर्थी से कई गुना अधिक फलदायी मानी जाती है।
सूर्याेदय से पहले स्नान करके पूरे दिन उपवास रखा जाता है। स्त्रियाॅं पूजा के लिये इस दिन गोबर से लीप कर चौक पूरने के बाद आसन पर गणेश जी के रूप में सब्जियों का पहाड़ सा बनाकर कपड़े से ढककर पूजन करती हैं। श्री गणेश जी को मोदक, दूर्वा, चन्दन, फूल आदि चढ़ाये जाते हैं।

बाद में दूसरे दिन उनके पुत्र के द्वारा शिल-लोड़ा के लोड़ा से कुचल कर खाया जाता हैं। शाम को गणेश जी की पूजा और मोदक का भोग लगाया जाता है, तथा चन्द्रोदय के बाद चन्द्रमा को जल का अघ्र्य (जल, दूध, चावल आदि मिलाकर) देना महत्वपूर्ण है। जिसके बाद व्रत का समापन होता है।


यह व्रत जीवन की सभी विघ्न बाधाओं को दूर करने और कार्यों में सफलता पाने के लिए किया जाता है। इस व्रत से संतान प्राप्ति और आर्थिक लाभ के साथ ही बुद्धि का वरदान भी मिलता है। श्री गणेश जी की पूजा से घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शुभता आती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री गणेश ने मंगल ग्रह को आशीर्वाद दिया था, जिस कारण यह तिथि और भी शुभ हो गयी है।

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