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लोक कवि ईसुरी की फागें

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लोक कवि ईसुरी का जन्म सन् 1825 ई॰ में मेंड़की नामक गाॅंव में हुआ था। यह गाॅंव झाॅंसी जनपद की मऊरानीपुर तहसील से पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित है। ईसुरी के पूर्वज ओरछा से आकर इस गाॅंव में बस गये थे। वे जुझौतिया ब्राह्मण थे।
ये नौगाॅंव (छतरपुर) के समीप धौर्रा व बगौरा गाॅंव के जमींदारों के यहाॅं कारिन्दा रहे। आजीवन साधारण वेतन लेकर ही वे अपनी मस्ती में मस्त रह कर लोगों में फागों द्वारा रस-संचार करते रहे। ईसुरी के कोई पुत्र नहीं था, अतः उनने दत्तक पुत्र लिया था। जिनके वंशज आज भी मेंड़की में खेतीबाड़ी करते हैं।
लोक कवि ईसुरी की फागों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं। –

जिदनाॅं लौट हेरतीं नइयाॅं, बुरऔं लगत है गुइयां।
सूक जात मौं बात कड़त ना, मन हो जात मरइयाॅं।
दुबका होय तौन कै डारौ, तुम हौ जौन करइयाॅं।
‘ईसुर’ झाॅंक-झाॅंक हम देखीं, कछवारे की कुइयाॅं।।

आॅंखें लगें फेर ना छूटें, कितनऊ धरौ धरे सें।
काये खाॅं भावी फिर बाॅंदौं, जौ अपराध गरे सें।
नेक-निवाउ कठिन हौ जैहे, सब सें मेर करे सें।
‘ईसुर’ विकत पराये हातन, प्रीत के फंद परे सें।।

तैने लै लये प्रान अहरिया, तिरछी मार नजरिया।
एकई पुरा, एकई बखरी, एकई चलन डगरिया।
एकई उठन, एकई बैठन, एकई परन सिजरिया।
‘ईसुर’ छुरी तुमाये हातन, करें घींच गिरधरिया।।

पैरे रजउ ने प्रान हरन के, ककना कोमल कर के।
बइॅंअन पै बाजूबंद बाॅंदे, बिगरू संग बरन के।
छापें-छड़ी बजुल्ला-छल्ला, गजरा कैउ लरन के।
तकत तीर से लगत ‘ईसुर’, जे नग तरन-तरन के।।

सपनन दिखा परे मोय सइयाॅं, सुनौ परौसन गुइयाॅं।
आपुन आप उसीसें ठाॅंड़े, झपट परी मैं पइयाॅं।
उनके दृग दोऊ भर आये, मोरी भरी उबइयाॅं।
‘ईसुर’ आॅंख दगा में खुल गई, हतौ उतै कोउ नइयाॅं।।

जिदना रजउ ने पैरौ गानौ, हर लऔ जिया विरानौ।
छूटा चार बिचैली पैरें, भरें फिरें गरदानौ।
जुबनन ऊपर चोली डाटें, ऊ पैं हार दिवानौ।
ई धज पै हो जात ‘ईसुर’, बरबस मन मरदानौ।।

देखीं रजउ काउ ने नइयाॅं, कौन बरन तन मइयाॅं।
काॅं तौ उनकी रहस-रास है, काॅं दये जनम गुसइनाॅं।
पैलऊॅं भेंट हमइॅं से ना भई, सई कृपा हम पइयाॅं।
‘ईसुर’ हम ने रजउ की फागें, कर दई मुलकन मइयाॅं।।

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