चित्र व आलेख- पूर्णिमा सिंह
Tesu (Lok Natya)- टेसू एक ऐसा लोक नाट्य है जो बुन्देलखण्ड के गाॅव-गाॅव में बालकों द्वारा शरदीय नवरात्रि की अष्टमी से आश्विन पूर्णिमा तक खेला जाता है। इस लोकपर्व से जुड़ी लोककथा का सार इस प्रकार है कि सुआटा नामक एक दैत्य किशोरियों को परेशान करता था। इसी समय टेसू नामक एक वीर पुरूष किशोरियों की रक्षा के लिये सुआटा से युद्ध करके उसे पराजित करता है और सुआटा की पुत्री झिंझिया से विवाह करता है।
टेसू आये वीरन वीर, हाथ लिये सोने के तीर।
एक तीर से मार दिया, राजा से व्यवहार किया।।
नौ मन पीसे, दस मन खाये।
घर घर टेसू माॅंगन जायै,
तो पड़वा बोले आये आये।

शौर्य गीत के बाद दाता की प्रशंसा तथा पैसा माॅंगने की बात शुरू होती है।
बड़ौ दुलारो बड़ी अटरियां, बड़ो जान के टेसू आये,
मैड़न मैड़न रासों फूले, वन फूले कचनार,
सदा बखरियां ऐसे फूले, जी में हाथी झुके दुआर।

यदि बालकों को पैसा नहीं मिलता तो वे जोर जोर से चिल्लाना शुरू कर देते-
टेसू मूते घर बल्लाये,
चकिया चूल्हे सब बह जाये,
नौन को डबला धरौ रै जाये।
इस के उपरान्त जब पैसा, आटा या अन्य वस्तु बालकों को उस घर से प्राप्त हो जाती तो वह घर के किसी कुॅंवारे बालक का नाम लेकर आशीष देते-
हिन्न खुरी भई हिन्न खुरी, हिन्ना माॅंगे तीन खुरी,
तीन खुरी को पऊआ, देहरी दूध जम्मऊआ,
देहरी बैठो कूकरा, खुषी रहे तेरो पूतरा।।
भीम चना भई भीम चना, भीम चना में रेबड़ी।
रामू को ब्याह हो, सो राम सीता सी जोड़ी।।





























































