चित्र व आलेख- पूर्णिमा सिंह
Kartik Snan- यह पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक मनाया जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली महिलाओं की टोली को ‘कतक्यारीं’ तथा टोली की प्रत्येक महिला को ‘सखी’ कहा जाता है। कतक्यारीं कृष्ण को ढूंढने विभिन्न नदी तालाबों पर जाती हैं और वहीं स्नान करती हैं।

स्नान के बाद जमीन पर छोटी सी ‘चैतरिया’ बनाकर मिट्टी से श्री कृष्ण की प्रतिमा बनाती हैं व मुकुट में मोर पंख लगाती हैं। अगरबत्ती, दीपक जलाकर लोंग, गंगाजल, भोग आदि से पूजा करती हैं। वे उन्हे ‘हरजू’ ( हरि जू ) कहकर पुकारती हैं। कतक्यारीं कृष्ण को ढूंढने विभिन्न नदी तालाबों पर जाती हैं और वहीं स्नान करती हैं। रास्त में सखी छेड़ने का लोकनाट्य होता है।

उठो मोरे हरजू भये भुनसारे, गऊअन के बॅंध खोलो सकारे।
उठ के कन्हैया प्यारे मुकुट संवारे, सुधक राधिका दोहन ल्याये। उठो मोरे हरजू भये भुनसारे ……
काहे की लुईया काहे की दुहनिया, को जो दोबे को जो दुआबे,
पाटे की लुईया सोने की दुहनिया, दोबे हरजू दुआबे राधा प्यरी। उठो मोरे हरजू भये भुनसारे …..
काहे के लोटा काहे के पानी, काहे की दातुन करत बिहारी,
सोने के लोटा जमुन जल पानी, लौंगा की दातुन करत बिहारी। उठो मोरे हरजू भये भुनसारे …..
कहत राधिका सुनो कन्हैया, कातिक कैसें अन्हैये।
राधे दामोदर बन जइये।
नित्य सबेरे भोरई उठ के, सपरईयन टेर कगईये। राधे दामोदर …..
नौन तेल को त्यागन करिये, कोरे तटन नहईये। राधे दामोदर….. खाट पिड़ी को त्यागन करिये, भू पै सैन लगईये। राधे दामोदर…..

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