Home स्थापत्य- झाँसी गणेश मंदिर, झाँसी दुर्ग

गणेश मंदिर, झाँसी दुर्ग

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चित्र व आलेख- विकास वैभव

Ganesh Temple, Jhansi Fort (u.p.)- उत्तर प्रदेश के दक्षिण पश्चिम छोर पर स्थित झाँसी का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास में अति महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से जुङे होने के कारण प्रत्येक भारतीय इस दुर्ग से भावनात्मक लगाव रखता है। प्राचीन काल में चेदी महाजनपद, कालान्तर में जैजाकभुक्ति, जुझौति एवं वर्तमान में बुन्देलखण्ड के नाम से यह क्षेत्र जाना जाता है। इस दुर्ग पर क्रमशः गौङ राजाओं, चंदेल राजाओं, खंगार राजाओं, बुन्देल राजाओं, उनके प्रतिनिधि रूप में गोसांईयों, मुगल तथा मराठाओं का अधिपत्य रहा।

मुख्य रूप से झाँसी दुर्ग के तीन भाग हैं, गणेश मंदिर, मौज महल तथा शंकर गढ़। गणेश मंदिर क्षेत्र बंगरा पहाङी का उत्तरी ढलान है। नगर की ओर से प्रवेश करने पर बारादरी के आगे तृतीय एवं चतुर्थ द्वार के मध्य ऊँचे मंच पर धनुषाकार वितान से आवृत एक कक्षीय गणेश मंदिर है। धनुषाकार वितान राजपूत स्थापत्य की विशेषता है। मंदिर में दोनों पार्श्वों एवं सम्मुख भाग में कटावदार मेहराब का एक-एक द्वार है। कौङी के प्लास्टर पर कत्थई रंग से चित्रण किया गया था। इसमें चतुर्मुखी गणपति की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। गणेश मंदिर के पीछे स्थित बुर्ज पर प्रसिद्ध तोप भवानी शंकर रखी है। चतुर्थ द्वार की ड्योढ़ी में दोनों पार्श्वो में तीन-तीन द्वार वाले कम ऊँचाई के दालान हैं, इनकी छत पर पहुँचने हेतु जीने बने हैं, नौबत है, इस पर बैठकर मंगल वाद्य बजाये जाते थे। नौबतखाने में बजने वाले मंगल वाद्य राजा का यशोगान करते थे। नौबतखाना को पार कर झाँसी दुर्ग के सबसे बङे मैदान में पहुँचते हैं।

निकट के दर्शनीय स्थल- राजकीय संग्रहालय, सिटी चर्च एवं रानीमहल।

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